– बोर्ड परीक्षा में नतीजे सुधारने के लिए प्राचार्यों पर कार्रवाई का असर, कई स्कूलों में अंग्रेजी के बजाय बैंकिंग-फाइनेंस जैसे विषय लेने का दबाव
रायपुर । प्रदेश में सरकारी स्कूलों के दसवीं और बारहवीं बोर्ड परीक्षा परिणाम सुधारने के लिए प्राचार्यों और स्कूल प्रबंधन पर कार्रवाई का दबाव अब विद्यार्थियों के विषय चयन तक पहुंचने लगा है। परिणाम सुधारने के लिए विद्यार्थियों को अंग्रेजी के बजाय बैंकिंग फाइनेंस जैसे विषयों का चयन करवाया जा रहा है। विद्यार्थियों को कक्षा 9वीं और 11वीं में उनकी पसंद के विषय देने के बजाय बैंकिंग, फाइनेंस और दूसरे विषय लेने के लिए बाध्य किए जा रहेे है। जिसके चलते ऐसे विद्यार्थी नर्सिंग एवं फार्मेसी जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने से वंचित हो रहे है।
शिक्षा व्यवस्था में आ रही इस संकट को देखते हुए छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन ने स्कूल शिक्षा सचिव को पत्र लिखकर शासकीय स्कूलों के प्राचार्यों एवं शिक्षकों की मनमानी रोकने के लिए निवेदन किया है। उन्होंने मांग की है कि सरकारी स्कूल में पढाई के इच्छुक प्रत्येक विद्यार्थी को मनचाहा विषय मिले ये सुनिश्चित किया जाए। एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने बताया कि बोर्ड परीक्षाओं में मन मुताबिक नतीजे न आने पर कार्रवाई से जमीनी स्तर पर विद्यार्थियों को अंग्रेजी विषय लेने से वंचित किया जा रहा है क्योंकि अंग्रेजी विषय के नतीजे शासकीय स्कूलों में अपेक्षा अनुसार नहीं आ रहे है। अंग्रेजी विषय के बदले नवमीं एवं ग्यारवीं में बैंकिंग फाइनेंस जैसे विषय लेने के लिए बाध्य किया जा रहा ताकि नतीजे अच्छे आए।
– शिक्षा का उद्देश हो रहा प्रभावित
राजीव गुप्ता ने बताया कि अंग्रेजी विषय के बगैर उत्तीर्ण हुए विद्यार्थियों को व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश नहीं मिल रहा है जैसे नर्सिंग एवं फार्मेसी के स्नातक पाठ्यक्रमों के प्रवेश में कक्षा बारवीं में अंग्रेजी विषय की अनिवार्यता है। इस तरह की मनमानी नियमों के विरुद्ध है और गरीब विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा से वंचित करना संविधान के खिलाफ भी है। अच्छे नतीजे के दबाव में शासकीय स्कूलों के विद्यार्थियों को उनकी इच्छा के विषय चुनने ना देने से परीक्षा से नतीजे भले मन मुताबिक आ जाएं लेकिन शिक्षा के उद्देश प्रभावित हो रहे हैं।
– कमजोर बच्चों को प्रवेश नहीं दे रहे थे शिक्षक
10वीं और 12वीं के रिजल्ट आने के बाद प्राचार्य पर हुए कार्यवाही के बाद स्कूल प्रवेश के समय भी प्रवेश न देने की शिकायतें भी सामने आई थी। जिसमें स्कूल की ओर से अपने परीक्षा परिणाम को सुधारने और खराब न करने के लिए ऐसे विद्याार्थियों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा था तो पढ़ने में कमजोर थे। साथ ही स्कूलों की ओर से प्रवेश में मनमानी की जा रही थी। अब इसका दूसरा परिणाम भी सामने आ गया है।
– ड्रॉपआउट कम करने की कोशिशों के बीच उलटा असर
देश और राज्यों में स्कूली शिक्षा में ड्रॉपआउट कम करने और विद्यार्थियों को माध्यमिक शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा से जोड़ने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। ऐसे में स्कूल में ही विषय चयन के अवसर सीमित होने से विद्यार्थियों की आगे की शिक्षा पर असर पड़ना एक गंभीर नीतिगत सवाल है। बोर्ड रिजल्ट सुधारने के लिए स्कूलों में शिक्षण व्यवस्था, अंग्रेजी शिक्षकों की उपलब्धता, अतिरिक्त कक्षाएं, और विषयवार शैक्षणिक सहायता मजबूत करने के बजाय विद्यार्थियों को कमजोर परिणाम वाले विषयों से ही दूर किया जा रहा है। ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में ड्रॉपआउट का आंकड़ा और बढ़ सकता है।




